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बाल संरक्षा-जानकारी चाहिए?

1 बच्चा किसे कहते हैं?
किशोर न्याय (बच्चों की संरक्षा तथा देखभाल) कानून 2000 के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को बच्चा कहते हैं। बच्चे की यह परिभाषा बच्चों के अधिकार के अंतर्राष्ट्रीय समझौते के अनुरूप भी है।

2 बाल संरक्षा का क्या अर्थ है?
बाल संरक्षा का प्रयोग विभिन्न संगठन विभिन्न परिस्थितियों में अलग अलग ढंग से करते हैं। बच्चे प्राय: हिंसा, शोषण, दर्ुव्ययवहार तथा उपेक्षा के शिकार होते हैं। बिलकुल सरल शब्दों में कहें तो बाल संरक्षा का अर्थ है बच्चे को किसी भी प्रकार के नुकसान से बचने का अधिकार सुरक्षित करना। यह दूसरे अर्थो में उन अधिकारों को भी पूरित करता है जो यह सुनिश्चित करते हैं कि बच्चों के जीने, अपना विकास करने तथा समृद्ध होने के लिए आवश्यक शर्तें पूरी हों।
एक सफल संरक्षा कार्यक्रम यह सुनिश्चित करता है कि बच्चे का स्वस्थ विकास हो, वह शारीरिक तथा मानसिक रूप से आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान से पूर्ण हो और इसलिए वह न ही अपने बच्चों का शोषण करेगा और न दूसरों का। (1)

3 'क़िशोर' किसे कहते हैं?
क़िशोर न्याय ( बच्चों की देखभाल और संरक्षा) कानून 2000 के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र का हर व्यक्ति 'किशोर' कहा जाता है। 'किशोर' का प्रयोग इस कानून के तहत उन किशोरों के लिए किया गया है जो कानून की हदों से बाहर आचरण कर रहे होते हैं।

4 क़िशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून 2000 क्या है?
किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून 2000  बच्चों की देखभाल और संरक्षा सुनिश्चित करने वाला प्रमुख कानून है। कानून की हदों से बाहर पाए जाने वाले किशोरों तथा संरक्षा एवं देखभाल के जरूरतमंद बच्चों संबंधी कानूनी प्रावधानों को और भी सुदृढ़ और बेहतर बनाने के लिए यह उनके विकास संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान मे रखकर तथा उनसे संबंधित मुकदमों की मध्यस्थता और निपटारे में बाल सहयोगी दृष्टिकोण अपनाकर यह कानून उनकी उचित देखभाल, संरक्षा तथा उपचार सुरक्षित करते हुए उनके हितों की रक्षा करने की कोशिश करता है।

5 क़ानून की हदों से बाहर बच्चे का क्या अर्थ है?
किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून 2000 के अनुसार ऐसे किशोर जिनपर किसी अपराध का आरोप है, कानून की हदों के बाहर के किशोर कहे जाते हैं

6. देखभाल तथा संरक्षा के जरूरतमंद बच्चे किन्हें कहते हैं?
किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून 2000 के अनुसार देखभाल और संरक्षा के जरूरतमंद बच्चे वह है।

  •  
  • जो बेघर-बार हैं या जिनके रहने की कोई निश्चित जगह नहीं है तथा जिनके जीविका का कोई स्पष्ट साधन नहीं है।

  •  
  • जो किसी ऐसे व्यक्ति के साथ रहता है (चाहे वह उसका अभिभावक हो या कोई अन्य व्यक्ति)जिसने उसे मारने या घायल करने की धमकी दी है और इस बात की संभावना है कि वह उस धमकी पर अमल भी कर सकता है या फिर उस व्यक्ति ने किसी दूसरे बच्चे की हत्या की है, उसके साथ गलत व्यवहार किया है या उसे तिरस्कृत किया हो।

  •  
  • जो शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांग या बीमार है या फिर किसी मारक या असाध्य बीमारी से ग्रस्त है और जिसकी देखभाल करने वाला कोई भी नहीं है।

  •  
  • जिसके माता-पिता या अभिभावक उसपर नियंत्रण रखने के लायक नहीं है या असमर्थ हैं।

  •  
  • जिसके माता-पिता नहीं हैं या जिसके माता-पिता उसकी देखभाल करने के लिए राजी नहीं हैं या फिर जो अपने माता-पिता द्वारा परित्यक्त है या जो गुमशुदा है और उसके माता-पिता का पता खोजने पर भी प्राप्त नहीं हो रहा है।

  •  
  • जिसे यौन कारणों या गैर-कानूनी कार्यों के लिए तिरस्कृत, प्रताड़ित या शोषित किया जा रहा है या किए जाने की संभावना है।

  •  
  • जो निर्बल है और जिसे मादक द्रव्यों के दुरूपयोग या मानव-व्यापार में शामिल किए जाने का खतरा है।

  •  
  • जिसका अनुचित लाभों के उद्देश्य से दुरूपयोग किया जा रहा है या किए जाने की संभावना है।

  •  
  • जो किसी भी प्रकार के सशस्त्र संघर्ष, नागरिक उथल पुथल या प्राकृतिक आपदा का शिकार है।

    7. क़िशोर न्याय बोर्ड क्या है?
    किशोर न्याय कानून 2000, के अनुसार किशोर न्याय बोर्ड राज्य सरकारों द्वारा कानून का अतिक्रमण करने वाले किशोरों से संबंधित विषयों पर विचार करने के लिए बनायी गयी संस्था है। इस बोर्ड में प्रथम श्रेणी के मेट्रोपोलिटन दंडाधिकारी या न्यायिक दंडाधिकारी के साथ ही दो सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं जिनमें से एक का महिला होना आवश्यक है।

    8. बाल कल्याण समिति क्या है?
    किशोर न्याय कानून 2000 के अनुसार देखभाल एवं संरक्षा के जरूरतमंद बच्चों के लिए हर जिले या कुछ जिलों को मिलाकर एक में बाल कल्याण समितियों की स्थापना का अधिकार राज्य सरकारों को दिया गया है। यह समिति देखभाल और संरक्षा के जरूरतमंद बच्चों की देखभाल, सुरक्षा, उपचार, विकास एवं पुनर्वास तथा उनकी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति तथा मानवाधिकारों की रक्षा से संबंधित हर मामले पर निर्णय देने वाली सर्वोच्च संस्था है। इस समिति में कुल 5 सदस्य होते हैं जिनमें अध्यक्ष भी शामिल होता है। इनमें से एक का महिला होना तथा एक अन्य को बच्चों के मामलों का विशेषज्ञ होना चाहिए।

    9 क़िशोरों के लिए विशेष पुलिस इकाई क्या है?
    किशोर न्याय कानून 2000 के अनुसार हर जिले तथा शहर में किशोर बाल कल्याण अधिकारी के रूप में बच्चों तथा किशोरों के प्रति पुलिस आचरण को बेहतर बनाने और उनके संयोजन के लिए पुलिस अधिकारी इस विशेष किशोर बल पुलिस इकाई के सदस्य के रूप में नामित किये जाते हैं। इस कानून में हर थाने में एक ऐसेंअधिकारी को किशोरबाल कल्याण अधिकारी के रूप में घोषित करने की व्यवस्था है जिनकी रूचि इस क्षेत्र में है तथा जिन्हें इसके लिए जरूरी प्रशिक्षण तथा अभिमुखीकरण प्रदान किया गया है। पुलिस के साथ मिलकर ये अधिकारी किशोरों तथा बच्चों से संबंधित मामलों को देखते हैं।

    10 क़िशोर न्याय कानून 2000 के क्रियान्वयन की क्या स्थितिहै।   
    सामाजिक न्याय तथा अधिकारिता मंत्रालय के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार 28 राज्यों तथा केंद्र-शासित प्रदेशों ने किशोर न्याय (बच्चों की संरक्षा तथा देखभाल ) कानून 2000 के तहत अपने अपने राज्योंप्रदेशों में कानून बनाया है। इस कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आवश्यक संस्थागत ढांचो अर्थात किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समिति इत्यादि बनाने की प्रक्रिया चल रही है। किशोर न्याय कानून 2000 के क्रियान्वयनताजा स्थिति के बारे में जानने के लिए देखें
    http://www.socialjustice.nic.in/social/impleJJ.htm

    11 दत्तक ग्रहण क्या है?
    दत्तक ग्रहण की सबसे मौलिक परिभाषा है उन लोगों के बीच माता पिता एवं बच्चे का संबंध स्थापित करना जो जन्म से इस संबंध मे नहीं बंधे हैं। इस मामले में कानून का यह न्यूनतम दायित्व है कि इस अस्वाभाविक संबंध को स्वाभाविक बनाने की कोशिश करना। इसका व्यासहारिक अर्थ यह है कि सामान्य रूप से माता पिता तथा उनके बच्चों के बीच जिस प्रकार के आपसी अधिकार और  कर्तव्य विद्यमान होते हैं वह अपने आप दत्तक संतान तथा उसे दत्तक के रूप मे स्वीकार करने वाले परिवार के बीच भी लागू माने जाएंगे।

    12 भारत में दत्तक ग्रहण सेवाओं को कौन नियामित करता है?
    केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधर एजेंसी (सीएआरए) क़ेंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त दत्तक ग्रहण एजेंसियों को नियामित करती है और उनपर नजर रखती है। यह स्वयंसेवी समन्वयक संस्थाओं तथा सूचीबद्ध भारतीय तथा विदेशी प्लेसमेंट संस्थाओं के साथ काफी करीबी ढंग से मिलकर काम करती है। अधिक से अधिक भारतीय बच्चों को दत्तक सेवाएं प्राप्त करवाने मे मदद करना इस एजेंसी का मुख्य उद्देश्य है।

    13. पालन-पोषण संबंधी देखभाल किसे कहते हैं?
    पालन पोषण संबंधी देखभाल परिवार-आधारित देखभाल की वह अस्थायी व्यवस्था है जो उन बच्चों को प्रदान की जाती है जो बाल संरक्षा संबंधी कारणों से या असाधारण विशिष्ट जरूरतों के कारण अपने परिवार के साथ नहीं रह सकते हैं या जिन्हें अंतत: दत्तक के रूप में दिया जाना है। इस तरह के देखभााल के दौरान परिस्थितियों का आकलन करते हुए बच्चे को थोड़े समय या लंबे समय के लिए किसी परिवार में रखा जाता है जहां आकर उसके माता-पिता उससे नियमित रूप से मिलते जुलते रहते हैं और अंतत: पुनर्वास के बाद बच्चे अपने घर को वापस लौट जाते हैं।
    पालन पोषण संबंधी देखभाल का यह कार्यक्रम इस मान्यता पर आधारित है कि परिवार के अंदर ही बच्चे के विकास का सर्वोत्तम परिवेश उपलब्ध होता है। पालन-पोषण संबंधी देखभाल करने वाला परिवार ऐसे बच्चों कलिए एक तात्कालिक परिवार का काम करता है जिनके माता-पिता उनका दायित्व पूर्णतया वहन करने के योग्य नहीं होते या अनिच्छुक होते हैं। इस तरह के परिवार मे बच्चे को रखने का उद्देश्य है यह सुनिश्चित करना कि जितनी जल्दी संभव हो बच्चे को अपने परिवार में वापस भेज दिया जाए।

    14. बाल प्रायोजन क्या है?
    बच्चों के लिए दीर्घ कालीन दृष्टिकोण से सहायता उपलब्ध करवाना और साथ ही दान दाताओं को एक बेहतर और आनंददायक अनुभव प्रदान करवाने के लिए बाल प्रायोजन की व्यवस्था की गई है। बाल-प्रायोजन पैसे देने वाले व्यक्ति और एक खास बच्चे के बीच ऐसा संबंध स्थापित करता है जिससे कि सामुदायिक विकास की चुनौती को एक व्यक्तिगत स्वरूप प्राप्त होता है और पैसे देने वाले को यह स्पष्ट दिखाई देता है कि किस प्रकार उसके दिए गए पैसे से एक बच्चे, परिवार और समुदाय का जीवन बेहतर हो रहा है। प्रायोजन शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पोषण तथा अन्य जरूरतों को पूरा करने में भी सहयोग करता है।
    किशोर न्याय कानून 2000 में परिवार, बाल-निवासों तथा विशेष प्रकार के निवासों के लिए बाल-प्रायोजन की व्यवस्था की गई है। इससे बच्चों की स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर उनके जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने में मदद मिलती है। यह राज्य सरकारों को विभिन्न प्रकार के बाल-प्रायोजनो जैसे व्यक्तिगत, सामूहिक या सामुदायिक बाल प्रायोजन योजनाओं के बारे में कानून बनाने का अधिकार देता है।

    15. बच्चों के अधिकारों का समझौता (सीआरसी) क्या है?
    सीअारसी का अर्थ है 'कंवेंशन ऑन दि राइट्स ऑफ दि चाइल्ड' अर्थात बच्चों के अधिकारों का समझौता। यह संयुक्त राष्ट्रसंघ के द्वारा स्वीकृत अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जिसे अमरीका के अलावा दुनियां के सभी देशों नें स्वीकार किया है। बच्चों के हित को सुनिश्चित करने के लिए इसमें कुछ मानकों को स्थापित किया गया है जिसपर सभी को अमल करना होता है। इसमे चार प्रकार के अधिकारों की चर्चा की गई है-विकास का अधिकार, संरक्षा का अधिकार, उत्तरजीविता का अधिकार तथा सहभागिता का अधिकार। संयुक्त राष्ट्रसंघ की आम सभा ने यह समझौता 20 नवंबर 1989 को स्वीकार किया। भारत सरकार ने इसकी पुष्टि 11 दिसंबर 1992 में की

    16. अधिकार आधारित दृष्टिकोण किसे कहते हैं?
    कार्यक्रमों के प्रति अधिकार आधारित दृष्टिकोण का अर्थ है कि विकास संबंधी अपने कार्यक्रमों के दौरान हम दुनियां भर में स्वीकृत मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों के प्रति सजग रहें। यही सिद्धांत बच्चों के अधिसंबंधी समझौते (सीआरसी) तथा महिलाओं के खिलाफ होनेवाले हर प्रकार के भेदभाव को समाप्त करने वाले समझौते (सीर्ऌड़ीएड़ब्ल्यू) क़ी भी मौलिक प्रस्थापनाएं हैं जिसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि
    मनुष्य के रूप मे हर व्यक्ति बराबर है
    हरेक व्यक्ति को इज्जत पाने का हक है
    हरेक को आत्म निर्णय, शांति तथा सुरक्षा का अधिकार है
    अधिकार आधारित दृष्टिकोण का यह अर्थ नहीं है कि समझौते के हर बिंदु को मापने के लिए विशेष सूचक हों  तथा इनके अनुरूप कार्यक्रम या प्रोजेक्ट के स्तर पर उचित समाधान की तलाश की जाए। बच्चों के अधिकारासंबंधी समझौते के मौलिक अनुच्छेदों में  गैर-भेदभाववादी, बच्चों के हित की सुरक्षा, प्रतिभागिता का अधिकार और अपनी बातों पर विचार किए जाने, उत्तरजीविता और विकास के अधिकार जैसे व्यापक सिद्धांतों को अभिव्यक्त किया गया है।

    17. बाल संरक्षा के लिए हमें अधिकार आधारित दृष्टिकोण की क्या जरूरत है?
    अधिकार आधारित दृष्टिकोण आवश्यकता आधारित दृष्टिकोण से मौलिक रूप से भिन्न है। अधिकार आधारित दृष्टिकोण से किसी घटना पर विचार करने से लोग अपने कानूनी अधिकार के बारे में सजग होते है तथा उनका सशक्तिकरण होता है। बच्चों की जरूरतों को अधिकार आधारित दृष्टिकोण से देखने का अर्थ होता है बच्चों के लिए किया जाने वाले हर कार्य को कानून के द्वारा उनको दिए गए अधिकारों के रूप में देखना न कि इस दृष्टि से  कि उन्हें एक खास ढंग के आचरण की आवश्यकता है।

    18 बच्चों के व्यापार का क्या मतलब है?
    बच्चों के व्यापार का अर्थ है देश या देश से बाहर धमकी देकर या किसी अन्य ढंग से से मजबूर कर, अपहरण कर या धोखे से या अपनी शक्तिशाली स्थिति के दुरूपयोग द्वारा या उस व्यक्ति की सहमति पैसे से प्राप्त कर, उसका शोषण करने के लिए या यह जानते हुए कि उसका शोषण हो सकता है, 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियों की भरती, उनका परिवहन, हस्तांतरण, छिपा कर रखना या दूसरे से प्राप्त करना। (2) बच्चों के व्यापार के मुख्य तत्व निम्नलिखित हैं:

  •  
  • 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों का शामिल होना

  •  
  • ऐसे लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ढोकर, कहीं से प्राप्त कर, खरीद या बेच कर, भरती कर,

  •  
  • हस्तांतरित कर या छुपाकर रखनाले जाना

  •  
  • बल-प्रयोग, धमकी, नशा या मादक द्रव्यों का प्रयोग ठगी या धोखा

  •  
  • बल-प्रयोग, धमकी, नशा या मादक द्रव्यों का प्रयोग ठगी या धोखे के लिए पैसे का लोभ देना

  •  
  • अन्य लोगों को प्राप्त होने वाला लाभ

  •  
  • व्यापार की प्रक्रिया में बच्चों का शोषण या फिर उनको बेच दिए जाने के बाद उनका शोषण्

    19 बाल दुव्यॅवहार किसे कहते है?
    बच्चों के कल्याण के लिए उत्तरदायी माता पिता, अभिभावक या अन्य व्यक्तियों द्वारा बच्चों का शारीरिक, यौन संबंधी या भावनात्मक उपेक्षा या दुव्यॅवहार ही बाल-उपेक्षा कहा जाता है। शारीरिक दुव्यॅवहार में शरीर को चोट पहुचाया जाता है-या ता पिटाई के कारण या फिर गलत ढंग से और कठोर अनुशासन लागू करने से। छेड़छाड़, अपने नजदीकी संबंधियों द्वारा यौन संबंध स्थापित किया जाना, बलात्कार, वेश्यावृत्ति या अश्लील कार्यों के लिए बच्चों का प्रयोग उनका यौन शोषण कहलाता है। उपेक्षा के कई स्वरूप हैं। शारीरिक उपेक्षा का अर्थ है बच्चे को त्याग देना या उसके स्वास्थ्य की देखभाल नहीं करना। शैक्षणिक उपेक्षा के कारण बच्चों को स्कूल जाने की सुविधा प्राप्त नहीं होती है। पतिपत्नी द्वारा एक दूसरे के साथा दुव्यॅवहार या बच्चे की उपस्थिति में दूसरे बच्चे के साथ दुव्यॅवहार या बच्चे को दिखाकर नशीले पदार्थो का सेवन भावनात्मक दुव्यॅवहार की श्रेणी मे आता है। अनुचित सजा, गाली गलौज, गलत दोषारोपण भी एक प्रकार के मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक दुव्यॅवहार कहलाते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि यदि माता पिता के व्यवहार का बच्चे के भविष्य पर खराब असर पड़ता है जैसे कि बच्चे को हिंसा से रूबरू करना या नुकसानदेह पदार्थो के संपर्क में लाना जैसे कि सिगरेट पीने के कारण अप्रत्यक्ष धूम्रपान, तो ऐसे आचरण को भी दुव्यॅवहार कहा जाना चाहिए। (3)

    20
    मनोआघात किसे कहते हैं?
    दुव्यॅवहार के बाद बच्चा जिस मन:स्थिति मे रहता है उसे मन: आघात कहते हैं। माता-पिता की अचानक मृत्यु, राष्ट्रीय आपदाओं के कारण भी बच्चा मनोघात की स्थिति में जा सकता है।

    21 बेधर बच्चे की क्या परिभाषा है?
     विश्व स्वास्थ्य संगठन (4) के अनुसार-
    बेघर बच्चा उसे कहते हैं जिसके रहने की कोई जगह नहीं हो और वह सड़कों पर ही अपना जीवन बिताता है। उसे या तो परिवार ने त्याग दिया होता है या उसके परिवार मे कोई भी जिंदा नही होता है। ऐसे बच्चे अपने जीने के लिए संघर्ष करते हैं और दोस्तों के पास जाकर रहते हैं या फिर इनके सहारे के लिए बनाए निवास में रहते हैं या ऐसे घरों में जिसमें लोगों ने रहना बंद कर दिया हो।
    बेघर बच्चा या अपने घर नियमित रूप से आ जा भी सकता है। वह रोज रात सोने के लिए अपने घर जा सकता है लेकिन दिन के समय और कभी कभार रात भी घर से बाहर बिताता है क्योंकि उसे घर के अंदर गरीबी, जरूरत से ज्यादा भीड़भाड़ या यौन संबंधी या शारीरिक दुव्यॅवहार का सामना करना होता है।
    ऐसे कुछ बच्चे सड़क के किनारे या फुटपाथ, चौराहे पर परिवार के अन्य सदस्यों के साथ जीवन गुजारते हैं। गरीबी, प्राकृतिक आपदा या युद्ध के कारण भी लोग सड़कों के किनारे जीवन बिताने को मजबूर हो जाते हैं। जरूरत होने पर वह अपना सामान एक जगह से दूसरे जगह लेकर चले जाते हैं। प्राय: ऐसे सडक के किनारे जीवन बिताने वाले परिवारों के बच्चे अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सड़क के किनारे ही कुछ काम भी करते हैं।
    संस्थगत देखभाल के अंतर्गत इन परिस्थितियों मे रहने वाले बच्चों के लिए यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती है कि उन्हें फिर से बेघर न होना पड़े

    22 बच्चे नशीली दवाओं का प्रयोग क्यों करते हैं?
    किशोरावस्था मे नई चीजों के प्रयोग करने की सहज प्रवृत्ति होती है। बच्चे कई कारणों से नशीली दवाइयों का प्रयोग करते हैं जैसे कि उत्सुकतावश, अकेलेपन की वजह से, मजा लेने के लिए, तनाव कम करने के लिए, अपने को वयस्क साबित करने के लिए या लोगों के साथ अपने को जोड़ने के लिए। यह कहना मुश्किल है कि कौन सा बच्चा सिर्फ प्रयोग करने के लिए नशीली दवाएं लेगा और किसे इसके कारण गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा

    23 ऌस बात के क्या लक्षण हैं कि बच्चा नशीले पदार्थों का सेवन करने लगा है?
    नशीली दवाओं के दुरूपयोग के बारे में चेतावनी निम्नलिखित लक्षणों से मिल सकती है-

  •  
  • पढ़ाई मे पिछड़ना

  •  
  • अपने चेहरे और शरीर की सुंदरता का ख्याल नहीं रखना

  •  
  • अलग थलग और लोगों से कटा कटा रहना, निराशा का भाव रखना, थकान

  •  
  • आक्रामक और विद्रोही आचरण् लड़ाकू होना और लोगों के साथ सहयोग का अभाव

  •  
  • परिवार के साथ संबंधों का खराब होना

  •  
  • नए ढंग के दोस्त बनना

  •  
  • खेल और अपनी हॉबी मे रूचि का अभाव

  •  
  • खाने और सोने की आदतों मे बदलाव

  •  
  • दवाओं या दवा से संबंधित तामझाम (सुइयां, पाइप, कागज, माचिस आदि) पाया जाना

  •  
  • शारीरिक परिवर्तन जैसे बिना सरदी खांसी के ही नजला, लाल आंखें, खांसना और हांफना, शरीर पर खरोंच या सुइयों के निशान वगैरह

    24. यदि आपका बच्चा नशीले पदार्थो का सेवन कर रहा हो तो क्या करना चाहिए?
    कुछेक मामलों में यह संभव होता है कि मां-बाप स्वयं अपने बच्चों से बातचीत कर उन्हें नशे के दुरूपयोग से रोक सकते हैं। यह तब सबसे आसान होता है जब बच्चा  कभी कभार सिर्फ मजा लेने के लिए मादक दवाएं ले रहा होता है। और निश्चय ही आप जितनी जल्दी अपने बच्चे से नशीली दवाओं के बारे मे बात करना शुरू करेंगे उतनी ही आपके बच्चो द्वारा नशीली दवाओं के सेवन की संभावना कम होगी। अगर बच्चा 20 वर्ष की उम्र तक शराब, तंबाकू या गांजे का सेवन नहीं करता है तो इस बात की बहुत ही कम संभावना है कि उसे मादक द्रव्यों संबंधी कोई गंभीर समस्या कभी भी होगी
    लेकिन अगर आपको लगता है कि बच्चा अपनी दवा खुद करने की कोशिश कर रहा है या वह नियमित रूप से नशीले पदार्थो का प्रयोग कर रहा है या उसे इसकी आदत लग चुकी है तो आपको तुरंत पेशेवरो से बात करने की जरूरत है। इस तरह की समस्याओं को माता-पिता अपने आप नहीं सुलझा सकते हैं। आप चाहें तो मदद मिल सकती है। नशीली दवाओं के दुरूपयोग की समस्या से निबटने के लिए कई स्वैच्छिक संस्थाएं, पेशेवर सामाजिक कार्यकर्ता, सलाह देने वाले, मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं जो इस काम के लिए प्रशिक्षित हैं। समय रहते कदम उठाने से जीवन भर की समस्या से बचा जा सकता है।

    25 एच.आई.वी. क़िसे कहते हैं?
    एचआईवी अर्थात ह्यूमन इम्यूनो डिफिसिएंसी वायरस नामक विषाणु के कारण ही एड्स होता है। यह विषाणु एक व्यक्ति से दूसरे के शरीर मे संक्रमित खून, वीर्य या योनिस्राव के द्वारा खरोंच लगी हुई त्वचा या म्यूकझिल्ली के रास्ते से प्रवेश करता है। इसके अलावा संक्रमित गर्भवती महिला से बच्चे में तथा ऐसी महिला के दूध से भी एड्स फैल सकता है। एचअाइवी युक्त लोगों को एच.आइ.वी. क़ा संक्रमण रहता है। इनमें से कुछ लोगको कालक्रम में एचआइवी संक्रमण के कारण एड्स हो सकता है।

    26 एड्स किसे कहते हैं?
    एड्स का पूरा नाम है अक्वायर्ड इम्यूनो-डिफिशिएंसी सिंड्रॉम
    अक्वायर्ड-का अर्थ है कि यह बीमारी वंशानुगत नहीं होती है बल्कि जन्म के बाद बीमारी पैदा करने वाले कारकों से संपर्क मे आने के कारण होती है। (इस मामले में यह कारक एचआइवी है।
    इम्यूनो-डिफिशिएंसी- का मतलब है कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आना। यह इस बीमारी का एक प्रमुख लक्षण है।
    सिंड्रॉम-कुछेक लक्षणों के एक साथ प्रकट होने को सिंड्रॉम कहा जाता है। एड्स की अवस्था में सिंड्रॉम के अंतर्गत अनेक प्रकार के संक्रमण, या कैंसर तथा व्यक्ति के रोग निरोधक तंत्र में कुछ खास कोशिकाओं की संख्या में कम एड्स की पहचान चिकित्सक द्वारा स्पष्ट जांच की प्रक्रिया के बाद की जाती है।

    27 एड्स होने के क्या कारण हैं?
    एड्स ह्यूमन इम्यूनोडिफिशिएंशी वायरस नामक विषाणु से संक्रमित होने के कारण होती है। यह विषाणु एक व्यक्ति से दूसरे में खून या यौन संबंध के द्वारा फैलता है। इसके अलावा गर्भवती महिला से गर्भावस्था मेया बच्चे के जन्म के दौरान उसके शिशु में या अपना दूध पिलाने से फैल सकता है।  एचआइवी युक्त लोगों को एचआइवी क़ा संक्रमण रहता है। इनमें से कुछ लोगों को कालक्रम में एचआइवी संक्रमण के कारणहो सकता है

    28 क्या बच्चों को भी एड्स हो सकता है?
     हां, बच्चे भी एड्स से प्रभावित या संक्रमित हो सकते हैं। दुनियां भर मे आज करीब 25 लाख बच्चे एड्स से संक्रमित हैं। अगर एड्स का फैलाव जारी रहा तो एड्स के कारण मरने वाले शिशुओं और बच्चों की संख्या में काफी वृद्धि हो सकती है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि सन 2000 तक करीब 1 करोड़ बच्चे एड्स के कारण अपने मां बाप के मरने से अनाथ हो चुके है।

    29. बच्चों और युवकों को एच.आइ.वी. से कैसे बचाया जा सकता है?
    यौनिक रूप से सक्रिय होने के पहले ही बच्चों तथा किशोरों को यह जानने का अधिकार है कि एचअाइवी संक्रमण से कैसे बचा जा सकता है। चूंकि कुछ युवक कम उम्र मे ही यौन संबंध बना लेते हैं इसलिए उन्हें कंडतथा उनकी उपलब्धि के बारे में जानना चाहिए। स्कूलों तथा मां बाप की यह जिम्मेवारी है कि बच्चे यह समझें कि एड्स से कैसे बचा जा सकता है तथा एड्स के साथ जीने वाले लोगों के साथ सहिष्णुतापूर्ण, सहानुभूतिपूण्र् तथा गैर भेदभाव वाला आचरण करना क्यों मंहत्वपूर्ण है।

    30. मां से गर्भ में स्थित बच्चे को एडस कैसे हो जाता है?
    गर्भ मे पल रहे बच्चे को मां के खून के द्वारा एड्स का संक्रमण हो सकता है। यह खतरा और भी बढ़ जाता है जब मां को एचआइवी संक्रमण हाल मे ही हुआ हो या वह एड्स की आखिरी अवस्था में हो। संक्रमणके जन्म के समय भी हो सकता है जब वह मां के खून के संपर्क में आता है। मां के दूध से भी संक्रमण बच्चे में जाने की थोड़ी संभावना होती है। तकरीबन 30 प्रतिशत मामलों में संक्रमित मां से बच्चे में संकपहुचने की संभावना रहती है।

    31. क्या मां के दूध के द्वारा भी एचआइवी संक्रमण फैल सकता है।
    हां, मां के दूध मे भी थोड़ी मात्रा मे यह विषाणु पाया जाता है और अध्ययनों से पता चला है कि संक्रमित मां के दूध से भी एड्स बच्चे मे पहुंच सकता है। लेकिन मां के दूध मे अनेक प्रकार के ऐसे तत्व होतहैं जो बच्चे के स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं और बच्चे को अपना दूध पिलाना से जच्चा बच्चा को निश्चित रूप से लाभ होता है। इसलिए मां के दूध से एड्स के प्रसार के खतरे की थोड़ी संभावना के बावजूद अपने लाभो के कारण मां का दूध पिलाना लाभदायक माना गया है।

    32 बाल संरक्षा की राष्ट्रीय पहल (एनआईसीपी) क्या है?
    बाल संरक्षा की राष्ट्रीय पहल (NICP) सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय समाज रक्षा संस्थान एवं चाइल्ड लाइन इंडिया फाउंडेशन के द्वारा चलाया जाने वाला अभियान है। इसका उधेश्य है 'हर बच्चे को उसका बचपन' सुनिश्चित करवाना। इसे हासिल करने के लिए यह संबंधित तंत्रों, गैर सरकारी संगठनों इत्यादि के बीच बाल-अधिकारों तथा  किशोर-न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षा) कानून 2000 की अच्छी समझदारी सुनिश्चित करना आवश्यक समझता है। राष्ट्रीय समाज रक्षा संस्थान किशोर न्याय व्यवस्था के तहत कार्यरत विभिन्न स्तरों के कार्यकर्ताओं के गहन प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण का कार्य करता है।

    33. बच्चों की संरक्षा के राष्ट्रीय पहल (एनआईसीपी) क़े तहत प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के लिए राष्ट्रीय समाज रक्षा संस्थान द्वारा कौन से कार्यक्रम चलाए जाते हैं।
    राष्ट्रीय समाज रक्षा संस्थान का बाल संरक्षा संभाग बाल संरक्षा तथा किशोर न्याय के क्षेत्र में सेवा प्रदाताओं के क्षमता निर्माण, शोध और प्रलेखीकरण के लिए जिम्मेवार हैं। एनआईसीपी क़े तहत संभाग बाल संरक्षा और किशोर न्याय के विषयों पर अनेक अल्पकालीन और दीर्घकालीन पाठयक्रम संचालित करता है। इनमें से कुछ प्रमुख पाठयक्रम इस प्रकार
    बाल संरक्षा पर एक महीने का सर्टिफिकेट कोर्स ***बेघर बच्चों को शिक्षित करने वाले लोगों के लिए परामर्शदातृ कौशल के बारे मे प्रशिक्षण
    ***किशोर न्याय के विषय में निम्नलिखित श्रेणी के लोगों के लिए विशेष अभिमुखीकरण और प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन

    (क) पुलिस अधिकारी
    (ख) किशोर न्याय बोर्ड और बाल कल्याण समिति के सदस्या
    (ग) गैर सरकारी संस्थाओं के कार्यकर्ता
    (घ) बाल निवास के अधीक्षकों, परिवीक्षा अधिकारी, जिला समाज कल्याण अधिकारी सहित राज्य सरकार तथा अन्य सरकारी कर्मचारी

    34. चाइल्ड लाइन क्या है?
    चाइल्डलाइन सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा 1998-99 में शुरू की गयी 24 घंटे चलने वाली फोन सेवा है। विपदाग्रस्त बालक या उसके बदले मे कोई भी वयस्क फोन पर 1098 डायल कर इस सेवा का लाभ उठा सकता है। यह विपदाग्रस्त बच्चे को आपातकालीन सहायता देता है तथा बाद में जरूरत के मुताबिक दीर्घकालीन देखभाल के लिए उचित संस्था मे भेजने की व्यवस्था करता है। चाइल्डलाइन सेवा अंभी देश के 65 जिलों में सक्रिय हैयह सेवा कहां कहां उपलब्ध है यह जानने के लिए देखें-
    http://www.childlineindia.org.in/childlinepresence.htm

    35
    संबंधित तंत्र किसे कहते हैं
     संबंधित तंत्र का अर्थ है ऐसे लोग जो बच्चों के संपर्क में प्रत्यक्ष रूप में तथा प्राय: आते रहते हैं। बच्चों के लिए सहयोगी परिवेश बनाने में ऐसे लोगों का बहुत बड़ा योगदान है। संबंधित तंत्र के अंतर्गत पुलिस, स्वास्थ्य सेवाएं, न्याय पालिका, किशोर न्याय तंत्र, शिक्षा तंत्र, परिवहन तंत्र, श्रम विभाग, मीडिया, दूरसंचार विभाग, कॉरपोरेट तंत्र, हमारे चुने गए प्रतिनिधि तथा हम सभी की गिनती होती है।

    (1) बाल संरक्षण-सांसदों के लिए पुस्तिका, यूनीसेफ 2004
    (2) लोगों, विशेष कर महिलाओं तथा बच्चो, की खरीद फरोख्त को रोकने, दबाने तथा दंडित करने के लिए बनाए गए संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रोटोकोल पर आधारित
    (3) कोलंबिया विश्वकोष, छठा संस्करण, कॉपीराइट कोलंबिया विश्वविद्यालय प्रेस, 2003
    (4)  विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा तैयार किया गया बेघर बच्चों का रेखाचित्र-मादक द्रव्यों के दुरूपयोग, यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य (जिसमे एचआइवीएड्स और यौन रोग शामिल हैं) के बारे में प्रशिक्षण का पैकेज
    (5) एचआईवी और एड्स पर प्राय: पूछे जाने वाले सवाल-एचआईवी, यौन रोग तथा टीबी क़ी रोकथाम का राष्ट्रीय केंद्र, रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीड़ीसी)

               http://www.cdc.gov/hiv/pubs/faqs.htm#definition  
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